Thursday, July 24, 2008

Memorabilia-II: Poets in the Making

This post is for my old friend Sabs, with whom it was originally written in fact, when we were both in class 8th (1991-92). And then it eventually got published in our school magazine the following year.

The strange thing is that Sabs stayed in our school for just that one year, and yet, even that short period of time was sufficient to forge some everlasting bonds between us!

The post… it’s entirely in Hindi, so I’m afraid not all my readers will be able to understand it.

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“हमारा कवियत्री बनने का असफल प्रयास”

जब हम अपने कवियत्री बनने के असफल प्रयास को स्मरण करते हैं, तो हमें रोने के साथ-साथ हँसी भी आती है. रोना इसलिए कि हम अपनी कवियत्री बनने की अभिलाषा को पूरी न कर सके, एवं हँसी इस बात को सोच-कर आती है कि इस चक्कर में हमने कैसी-कैसी ऊट-पटांग कविताएँ बना डाली!

अब हम ठहरे गरीबों में से एक – शब्दों का अभाव हुआ. प्रमुख उद्देश्य ‘rhyming’ शब्द बनाने का था. जैसा सोचते, वैसा लिखते गए.

सबसे पहले हमने सोचा कि बड़े से बड़े कवी भी प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन करते हैं… तो हम भी किसी से कम थोड़े ही हैं!

प्रकृति में फूल के महत्व की कोई शंका नहीं. तो हमने सोचा कि हम भी फूल की ही प्रशंसा करेंगे. दो दिन और रात हमने फूल के बारे में सोचते हुए व्यतीत कर दिए. परिणाम आपके सामने है…


सुन्दर फूल

ये हैं सुन्दर फूल कैसे?
हरे पत्ते मेंढक के जैसे.
पंखुड़ियाँ गंगा सम पीली,
ओस के कारण हो गयीं गीली.
दिन भर भौरे मंडराते हैं,
बेसुरा गीत अक्सर गाते हैं.
(बेसुरे गीत का फूल से क्या ताल्लुक है,
इसे हम आज भी नहीं जान सके!)


परन्तु ये कविता हमें अपने स्तर की नहीं लगी. इसलिए हमने सोचा कि हम कोई दूसरी कविता लिखेंगे जो कि दूसरों की कविताओं से भिन्न हो.

भाग्य की बात है कि उस दिन हमने एक भूत की कहानी पढ़ी, और हम पर भूत की कविता लिखने का भूत सवार हो गया! भूत की कविता बनाने के हमारे जतन का फल देखिये…


खेत और प्रेत

यहाँ पर है एक खेत
इसमें रहते भूत-प्रेत
वो रात को आते हैं
चूहों का मांस खाते हैं
इस खेत में है एक पेड़
जिसमें रहते भूत डेढ़ (१ ½)
मतलब एक है बाप मोटा
और उसका बच्चा छोटा


जब हमने अपनी तैयार की गयी इन कविताओं को फिर से पढ़ा, तो हमें ये कुछ जँची नहीं. हमें ये अत्यंत ही निम्न स्तर की कविताएँ लगीं. तो हमने सोचा कि अब हमें वस्तुतः कोई अच्छी कविता बनानी चाहिए, जो कि अद्वितीय हो, और जिसकी लोग प्रशंसा करते थकें नहीं. तब हमने अपने ये “बडबड गीत” ईजाद किये…


बडबड गीत

एक था राजा, एक थी रानी
रानी थी अंधों में कानी
हरदम पीती थी वह पानी
करती थी अपनी मनमानी

एक था लड़का, नाम था “खान”
खोली थी रद्दी की दूकान
करता नहीं था ठीक से काम
बढ़ा दिए थे सबके दाम

एक था लड़का, एक थी लड़की
दोनों में थी लड़की बडकी
उनके घर में थी तब कडकी
मनपसंद जगह उनकी थी खिड़की

मैंने एक को मारा था
दुसरे का चढ़ गया पारा था
तीसरे ने जोर से मारा मुझे
और वो भी मुझसे बिना पूछे

बम ढम बम ढम बम ढम भोले
गाँव के तांत्रिक जी बोले
जल्दी लाओ गरम गरम छोले
वरना पड़ने लगेंगे ओले

ये थे मेरे “बडबड गीत”
कैसे हुए आपको प्रतीत
हालांकि आज के ख्यालात के हैं बिलकुल विपरीत
फिर भी हैं न बढ़िया मेरे ये “बडबड गीत”?


इस मालिकतुकड़े, यानी की ‘master piece’, के निर्माण के बाद हमें मिलना तो चाहिए था इनाम. परन्तु मिला क्या? जूते!

बाद इसके कविता के लिए
उठाई नहीं हमने कलम
याद रखेंगे इस घटना को
हम हर वक़्त और हरदम!

धन्यवाद.

. . .

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8 comments:

Mahesh Nayak said...

Sorry dude, all hindi. Couldnt understand - yet I have commented ;)

Neelabh said...

@mahesh

call her dudette.

@Kaddu

Try reading Harishankar Parsai sometime. He is too good.

Kaddu said...

Re: dudette
I rarely behave like a girl with him

Re: Harishankar Parsai
What does he write?

Neelabh said...

he is a hindi vyangkar..

Kaddu said...

ah ok

Mahesh Nayak said...

To Neelabh
Looks deceive. To remind myself of that fact frequently I call kaddu a dude. Thats all. :)

Kaddu said...

Ha ha! And the rest of the time he calls me "Sexy babes" or "Kaddu maata"! What a contrast! ... Dude - Sexy - Maata! Guess I really do have a multiple personality!

Lotstodo said...

Hahahahahahahahah haa haaa haaaaaaaaaa ....ooooh. thanks so much for taking the effort to type this out . bahut mazaa aaya. this article was our maliktukda :-*

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